
दो साल… सिर्फ कैलेंडर के पन्ने नहीं थे, बल्कि हर दिन एक डर, हर रात एक दहशत। और फिर उसी गाज़ा की जमीन पर, जहां कभी सिर्फ धमाकों की आवाज गूंजती थी, आज “अल्लाहु अकबर” की पुकार सुनाई दी।
यह सिर्फ नमाज़ नहीं थी… यह जिद थी—जिंदगी की, उम्मीद की, और उस यकीन की कि बर्बादी के बाद भी इंसान खड़ा होता है।
दो साल बाद लौटी ईद की रौनक
Eid al-Fitr के मौके पर Gaza City के Saraya Square में नमाज़ अदा की गई—पूरे दो साल बाद। यह वही जगह है, जहां कभी बाजार सजते थे, बच्चे खेलते थे… और फिर जंग ने सब कुछ छीन लिया। आज यहां फिर लोग जुटे—लेकिन चेहरे वही नहीं थे। कुछ खो गए, कुछ टूट गए, और कुछ बस खामोशी में बदल गए।
जंग के जख्म और इबादत की जिद
नमाज़ के लिए जब लोग जमा हुए, तो उनके पैरों के नीचे जमीन नहीं, यादों का मलबा था। एक बुजुर्ग ने धीमी आवाज में कहा, “हमने अपने घर खोए, अपने लोग खोए… लेकिन इबादत नहीं छोड़ी।”
यह जुमला सिर्फ बयान नहीं, बल्कि गाज़ा की पूरी कहानी है।
‘शांति’ की बातें, और जमीन पर सन्नाटा
दुनिया के बड़े-बड़े मंचों पर ‘पीस टॉक्स’ की बातें होती हैं…और यहां लोग अपने बच्चों के नाम कब्रों पर लिख रहे होते हैं।

सवाल यह है, क्या शांति सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बची है?
मानवता बनाम राजनीति: कौन जीता?
Gaza Strip में यह ईद सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि एक संदेश था— कि इंसानियत अभी जिंदा है। राजनीति अपनी जगह है, रणनीति अपनी जगह…लेकिन जब एक मां अपने बच्चे को लेकर नमाज़ पढ़ने आती है, तो वह दुनिया को बता देती है “हम अभी खत्म नहीं हुए।”
भावनाओं का सैलाब: नमाज़ में आंसू भी शामिल थे
इस बार सजदे में सिर्फ दुआएं नहीं थीं, आंसू भी थे। हर “आमीन” के पीछे एक कहानी थी किसी का घर, किसी का भाई, किसी का बचपन। और फिर भी, लोग आए… क्योंकि उम्मीद छोड़ना सबसे बड़ी हार होती है।
ड्रामा नहीं, हकीकत है ये
यह कोई फिल्मी सीन नहीं…यह असली जिंदगी है, जहां लोग हर दिन मरते हैं और फिर भी जीने की कोशिश करते हैं। गाज़ा की यह ईद हमें याद दिलाती है कि इंसान टूट सकता है… लेकिन झुकता नहीं।
“तेहरान में बम, प्रयागराज में बोतल महंगी! जंग की आग अब आपकी जेब तक”
